Virtual Siyahi

आज़माइश

जब कदम साथ नहीं देते
और ज़ेहन दम तोड़ने लगता है
मन से हारने लग जाती हु
और तन साथ छोड़ने लगता है

उस वक़्त भी कुछ होता है
मेरे भीतर जो मुझे थकने नहीं देता
आगे बढ़ न पाउ भले ही मैं
पर मुझे रुकने भी नहीं देता

बस कुछ कदम और चल तू
बस थोड़ी हिम्मत और रख तू
जब लगे की अब बस और नहीं होगा
तब ही कुछ ऐसा कर तू
की तू चाहे तो भी थक न पाए

खुद को इतना बुलन्द कर तू
की किसीके रोके रुक न पाए
हाथ थाम बस अपने साहस का
आगे बढ़ तू

ये जंग मेरी किसी और से नहीं
ये मेरी खुद से खुद की आज़माइश है
चाँद से मुझे कोई बेर नहीं पर मुझे पूरा अस्मा पाने की ख़्वाहिश है

प्रियंका©

10 thoughts on “आज़माइश

  1. Awesome write up, loved it a lot, specially loved the last line, the war with the self is the toughest one and presently from last one month i am doing the same,somehow managed to get win over it.

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