virtual siyahi

बेज़ुबान

सोचा की यह देहलीज़ लाँघ दू,
की अब और सहा नहीं जाता..
कितना भी सोच लू पर अब और
कुछ कहा नहीं जाता..

आज अपने ही हाथो से मैंने
अपने सपनों को तोड़ा हैं..
इन बेज़ुबान पन्नों को अपने इन हाथो से
फाड़कर अपनी मुट्ठी में मड़ोड़ा है…

पर ज़रा मेरे सपनों की शिद्दत तो देखिये..
की बिखरे पन्नो से भी वफ़ा की हवा आती है
ये मुझसे एक बार फिर से उठ खड़े होने की दरखास्त करते है

शायद कोई कहानी अधूरी है जो पूरी होनी बाकि है..
शायद कुछ अनकहे फ़साने है जो फिर से बुनने है…
थोड़ा और सुनना है और कुछ कहना बाकि है
अभी मैं इस ज़िन्दगी में मौजूद हु और मुझमे कुछ साँसे बाकि है

प्रियंका

#वर्चुअलसियाही

26 thoughts on “बेज़ुबान”

  1. बहुत खूब प्रियंका
    बेहतरीन लिखाई 👌

    जिंदगी मे भी यूही इसी लिखाई की तरह
    खूबसूरत रंग भरते रहना ✌

I would love to hear from you 💜