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Virtual Siyahi

मैं लेख़क नहीं

मेरे शब्दों पे न जाओ के मैं कोई लेख़क नहीं
मैं तो बस इक आवाज़ हूँ
एक अनसुना सा आगाज़ हूँ

मैं दबे हुए पन्नों में खोए हुए आँसुओ की धुंदली बुँदे हूँ
जो पलकों के झपकते ही ग़ुमनामी की सियाही में ग़ुम हो जाते है

मैं अपनी ही धुन से बना हुआ एक बेग़ाना अंदाज़ हूँ
मैं कलम का सहारा लेकर रोज़ सरहदें पार करती हूँ

मैं लेख़क नहीं बस शब्दों की प्रेमीका हूँ

कलम , सियाही , पुराने पन्ने मेरे साथी और साझेदार है

किताबों की धूल और उसकी खुश्बू मुझे बेहद अज़ीज़ है
मैं नित नए शब्दों की तलाश में कई रंगो में डूब जाती हूँ
और नयी रचनाये गड़ती हूँ।

पर मैं लेख़क नहीं मैं बस एक कलाकार हूँ
शब्दों और वक़्त की सियाही में डूबा, एक फ़नकार हूँ।

-प्रियंका

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