Virtual Siyahi

वजूद – Existence

सूखे पेड़ों के पत्तों की तरह बिखरा सा ये वजूद

अपने अस्तित्व की तलाश में निकला था ये वजूद

रास्ते में कांटे हज़ार मिले

कठिनाई के साये हर बार मिले

हर मोड़ पर खड़ा था एक मुसाफ़िर

कुछ जुड़ते गए इस कारवां में

और कुछ ने किये बस शिक़वे गीले

अकेले चलने का मज़ा भी कुछ और है

बिच राह में गिरने का मज़ा भी कुछ और है

उठते नहीं जब हाथ गिरते हुए को उठाने को

उस सबक को सिख लेने का मज़ा भी कुछ और है

जितना आगे चले

उतना जीवन के करीब हो चले

अब जाना की जिस वजूद की तलाश में हम हर पल भटकते रहे

वो तो मेरे भीतर ही था कही

आँखे बंद कर एक कोने में

जब बैठ मैंने उसकी आवाज़ सुनी

मानो जैसे कह रही हो

की मैं ही तो हु वो जिसे तुम ढूंढ़ती हो हर कही

यूही नहीं कहती मैं ये तुमसे बार बार

की चाहे रास्ते में कांटे हो हज़ार

लोग तुम्हे हर मोड़ पर गिराने को हो तैयार

तुम्हे बस अपने काबिल बनना है

गिरने के बाद खुद संभालना हैं

अपने वजूद का हाथ थामे अपनी मंज़िल को हासिल करना हैं

प्रियंका

6 thoughts on “वजूद – Existence

  1. जीवन की व्याख्या करती व प्रोत्साहित करती सुन्दर कविता।

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