Virtual Siyahi

संघर्ष मेरा साँझा

नित प्र्यासी मैं
मौन और उपवासी मैं

तन के भीतर ह्रदय के तार से
अंतर मन के टूटे से एक द्वार से

एक आवाज़ सी सुनाई आती है
अपनी ही रूह में सिमटती हुई
एक ओझल परछाई सी नज़र आती है

मन विचलित
तन कपकपाता हुआ
ज़ेहन के हर तार को बुदबुदाता हुआ

एक और से दूजी और जाता हुआ भटकता ये मन
और उसकी कभी न ख़तम होने वाली उलझन

आगे बढू या रुक जाऊ
ज़िद ये अपनी ठान लू या हार मान लू

मेरे सवाल ही मेरे जवाब है
क्युकी ज़िन्दगी कहा बेहिसाब है

ये जीवन भी तो एक खेल ही है
जो खेल गया यह जीवन खेल वही तो सच्चा कलाकार है

जो मेरा साहस मेरा सारथि है
मेरा संघर्ष मेरा साझेदार है

–प्रियंका©

4 thoughts on “संघर्ष मेरा साँझा

  1. Priyanka this is superb! Every single day we wonder whether to carry on or to give up. Our struggles are as much a part of us as are our destinations. Wonderfully penned!

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