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Virtual Siyahi

ए ज़िन्दगी

आज़मा ले ए ज़िन्दगी

की अब भी साँसे बाकि है ..

जो न देखा है मंज़र

वो भी देखना बाकि है

जो तप कर ही सोना बनता है

और घिस कर ही हिरा निखरता है

तो तेरा ये सितम भी मंज़ूर है

तुझे हासिल कर सकू

उसके लिए ये ग़म भी मंज़ूर है

पर एहसान इतना करना मुझपर

की जब तू हार मान ले तो मुझे इक्तिला हो जाए

तुझसे लड़ते हुए कुछ साँसे तो बचा लुंगी

बची हुई ज़िन्दगी को मुस्कुरा कर गुज़ार लुंगी

-प्रियंका

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10 thoughts on “ए ज़िन्दगी

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