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प्रति – योगिनी

यह पल एक जीवन शाला है
इसके तृण तृण में सार समाया है
कुछ मिथ्या है तो कुछ सत्य
कुछ मिलावट है तो कही थोड़ी सजावट है

रोज़ नए पाठ पढ़ाते हुए
हर एक क्षण का हिसाब लगाते हुए
समय की सुई के साथ कदम मिलाते हुए
बस चलते जाना है

जो ये खेल है जीवन का, तो कठोर तप मेरा सांझाकार है
जो ये खेल है बल बुद्धि का, तो मेरा आत्मविश्वास मेरा साझेदार है

ज़िन्दगी में उतार चढ़ाव का सामना करना अब कुछ हद तक सीख लिया
जो न सीखा उसके लिए तैयार हूँ
ये जीवन पथ जो राह है
खुद से वाकिफ होजाने को को मैं तैयार हूँ

अगर जो ये पथ मेरा कर्म प्रतिष्ठान है
और जो मेरे चुने हुए रास्ते मेरे किरदार के बोधिनी है
तो इस पथ को अपनाते हुए मैं एक प्रति- योगिनी हूँ

प्रियंका©

10 thoughts on “प्रति – योगिनी

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