“जीवन खेला”

हम अक्सर हार जाने की शिक़ायत करते है और कई बार किसी चीज़ में हिस्सा ही नहीं लेते क्यूकी हम हारने से डरते है हमारे हार जाने में और पहले ही हार मान लेने के बीच का जो फासला है, मैंने ठीक उसी फासले को अपना जीवन मान लिया है जिस दिन मैंने कोशिशे करनी … Continue reading “जीवन खेला”

अब डर नहीं लगता

अब मुझे डर नहीं लगता गिर जाने सेअकेले चलने सेथकने सेहारने सेरोने से मैंने ये खेल खेलना नहीं सीखापर हर खेल को नया रूप देना सीख लिया है मुझे शुन्य से अब डर नहीं लगताखुद को बार बार खड़ा करने से डर नहीं लगता वो हद बहुत पीछे छूट गयीजिस हद ने मेरी सीमा तय … Continue reading अब डर नहीं लगता

नाराज़ है प्रकृति

सोचा की आज तुझे थोड़ा निहार लू दो पल तेरी खुशबू में खो जाऊ मन किया की आज कुछ देर तेरी छाँव में सो जाऊ तू कुछ नाराज़ सी मालूम होती है मुझे तू बहुत ही व्याकुल सी जान पड़ती है हा तेरी नाराज़गी भी जायज़ है तू मुफ्त में जो मिल जाती है अपने … Continue reading नाराज़ है प्रकृति

आख़िर यह मसला क्या है

हर बात बस यही रुक जाती हैये जद्दोजहद का मसला क्या है क़ुरान-ए-पाक और श्रीमदभगवत गीता में ये चर्चा कहा हैइस मिटटी में सोना पनपता था जो कभीजिस धरोहर की दुहाई ज़माना दिया फिरता है उस गुल-ए-हिंदुस्तान का आखिर ये सियासती मसला क्या है गंगा जमुनी से यह उर्दूगुरबानी की मिठास में रूह सजोती हुईजाप … Continue reading आख़िर यह मसला क्या है