क्या मैं ख़ुश होती?

आज अगर मैं लिख ना रही होती तो शायद मेरी ज़िंदगी कुछ और होती, पर कैसी वाली और? जैसी लोगों को पसंद आती है वैसी या जैसी लोगों के समझ में फ़िट हो पाती है वैसी? मैं लिखती नहीं तो शायद आज मैं कही जॉब कर रही होती पर क्या मैं ख़ुश होती? मैं आज … Continue reading क्या मैं ख़ुश होती?

“जीवन खेला”

हम अक्सर हार जाने की शिक़ायत करते है और कई बार किसी चीज़ में हिस्सा ही नहीं लेते क्यूकी हम हारने से डरते है हमारे हार जाने में और पहले ही हार मान लेने के बीच का जो फासला है, मैंने ठीक उसी फासले को अपना जीवन मान लिया है जिस दिन मैंने कोशिशे करनी … Continue reading “जीवन खेला”

अब डर नहीं लगता

अब मुझे डर नहीं लगता गिर जाने सेअकेले चलने सेथकने सेहारने सेरोने से मैंने ये खेल खेलना नहीं सीखापर हर खेल को नया रूप देना सीख लिया है मुझे शुन्य से अब डर नहीं लगताखुद को बार बार खड़ा करने से डर नहीं लगता वो हद बहुत पीछे छूट गयीजिस हद ने मेरी सीमा तय … Continue reading अब डर नहीं लगता