दिए सा जलना तुम

इक दिया दहलीज़ पर रखा था मैंने कि तेज़ हवा का झोंका आया संग अपने इक पेगाम लाया पेगाम में इक तूफ़ान का अंदेशा था उस तूफ़ान के आगे मेरा दिया टिक ना पाया मैंने फिर अपनी दहलीज़ पर इक दिया लगाया मेरा आँगन फिर से ठीक उसी तरह जगमगाया पर ना जाने क्यूँ फिर … Continue reading दिए सा जलना तुम

जाने देने का सुख

जाने देने में भी एक सुख है जिसका एहसास बड़े लम्बे समय बाद होता है हाँ, किसी को जाने देना आसान तो नहीं होता पर एक वक़्त के बाद दोनो सिरे खींचते खींचते, कसने लग जाते है वो एक दूसरे की क्षमता पर रह जाता है कि कितना और खींचना है और, उस खिंचाव की … Continue reading जाने देने का सुख

क्या मैं ख़ुश होती?

आज अगर मैं लिख ना रही होती तो शायद मेरी ज़िंदगी कुछ और होती, पर कैसी वाली और? जैसी लोगों को पसंद आती है वैसी या जैसी लोगों के समझ में फ़िट हो पाती है वैसी? मैं लिखती नहीं तो शायद आज मैं कही जॉब कर रही होती पर क्या मैं ख़ुश होती? मैं आज … Continue reading क्या मैं ख़ुश होती?

“जीवन खेला”

हम अक्सर हार जाने की शिक़ायत करते है और कई बार किसी चीज़ में हिस्सा ही नहीं लेते क्यूकी हम हारने से डरते है हमारे हार जाने में और पहले ही हार मान लेने के बीच का जो फासला है, मैंने ठीक उसी फासले को अपना जीवन मान लिया है जिस दिन मैंने कोशिशे करनी … Continue reading “जीवन खेला”